सच तुम्हारी आंखें हैं, कयामत हैं और कहती हो कि ‘नयनों की सुनीओ, नयना ठग लेंगे।’ अरे कमबख्त, ठगा तो मैं जा चुका हूं और ये भी सच है कि ठगा तुम्हारे नयनों ने ही है। तुम्हारी आंखों में देखना अच्छा लगता है। तुम्हारे नयन-नक्श को निहारना मुझे पसंद है। शायद तुम सोचा करती होगी कि आखिर कब तुम्हें मैनें इतने गौर से देखा। देखा तो रोज ही करता हूं मैं तुम्हें। तुम्हारी एक झलक सदियों के सकून का एहसास देती है। तुम्हारे नयनों में झांककर कुछ कहने का अपना एक अलग ही सुख है। तुम्हारा चेहरा इतना दिलकश है कि उसे अपने मोबाईल के वॉलपेपर पर सजाये घूमता हूं। जब भी तुम्हारा गली-चौराहे पर दिदार होता है मन में इक कूहूक सी उठती है कि काश ये यूनिवर्सल ब्यूटी मेरी होती। सपना है, जानता हूं पर जब सपना इतना दिलकश हो तो देखने में हर्ज ही क्या है?